Pandit Vipin Krishna Shastri: Astrolger & Katha Vyas

Pandit Vipin Krishna Shastri-Astrolger & Katha Vyas

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Thursday, 27 August 2015

ज्योतिष में केतु ग्रह का जातक पर प्रभाव


केतु एक छाया ग्रह है केतु मंडल ध्वजाकार है मनुष्य के शरीर में केतु अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है केतु ग्रह के सूर्य और चन्द्रमा शत्रु हैं.

जन्म कुण्डली में प्रथम लग्न भाव ,षष्ठम भाव ,अष्ठम भाव ,और एकादश भाव में केतु ग्रह को शुभ नहीं माना जाता है. कुण्डली में केतु ग्रह के द्वारा जब जातक पीड़ित रहता है तो जातक के व्यवहार में विकारता दिखाई देने लगती है जातक के मन दुराचार की भावना प्रबल हो जाती है, वात  कफ जन्य रोग से जातक पीड़ित रहता है. कुण्डली में जिस भी भाव में केतु रहता है उसी भाव के अनुरूप केतु अपना अच्छा और बुरा प्रभाव अवश्य डालता है. जीवन को संघर्षमय बना देता है. यह एक ऊष्ण और तमोगुणी ग्रह है और केतु की मीन और धनु उच्च राशियाँ हैं. केतु के कुप्रभाव से जोड़ों में दर्द,संतान कष्ट,पारिवारिक कलह,पेशाब संबधित विकार से जातक पीड़ित रहता है.

कुण्डली में केतु और सूर्य ग्रह की युति होने से व्यवसाय में उतार चढ़ाव देखने को मिलता है. जातक के पिता के 
स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. यश सम्मान, प्रतिष्ठा और सुख में कमी आती है.

चन्द्रमा और केतु की युति होने से मानसिक तनाव बढ़ता है.

केतु और मंगल की युति होने से जातक के अंदर क्रोध की अधिकता, हिसा की प्रवृति दिखाई देने लगती है.

केतु और बुध की युति होने से जातक के अंदर कपट की भावना बढ़ने लगती है और जातक धर्म कर्म से हीन होकर 
नास्तिक बन जाता है.

केतु और गुरु की युति होने से जातक के नास्तिकता बढ़ने लगती है और जातक के अंदर सत्वगुण में कमी आने लगती है.

केतु और शुक्र की युति होने से जातक के अंदर  स्त्री लोलुपता की भावना बढ़ने लगती है.

केतु और शनि की युति होने से जातक के अंदर हिसक प्रवृत्ति बढ़ने लगती है और जातक आत्मघाती भी बनने लगता है.

इसलिए केतु ग्रह से यदि कोई पीड़ित हो तो किसी अच्छे विद्वान से कुण्डली का विश्लेषण अवश्य करवाएं

केतु ग्रह की शान्ति के लिये उपाय


केतु ग्रह के मन्त्र का अवश्य जाप करें. हनुमान जी की उपासना करें. मंगलवार का व्रत रखें अन्यथा सर्वारिष्ट शान्ति हेतु शिवार्चन और महा मृत्युंजय का जाप करें.

शुभम भूयात् 
पंडित आचार्य विपिन कृष्ण कांडपाल
Pandit Vipin Krishna Kandpal

Wednesday, 17 July 2013

मानव जीवन पर ग्रह राशियों का नकारात्मक प्रभाव -ज्योतिष कुंडली

ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उनको नुकसान पहुंचाता है। नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।

वैदिक वाक्य है कि पिछले जन्म में किया हुआ पाप इस जन्म में रोग के रूप में सामने आता है। शास्त्रों में बताया है--पूर्व जन्मकृतं पापं व्याधिरूपेण जायते- अत: पाप जितना कम करेंगेरोग उतने ही कम होंगे। अग्निपृथ्वीजलआकाश और वायु इन्हीं पांच तत्वों से यह नश्वर शरीर निर्मित हुआ है।

इन्हीं में मेष
सिंह और धनु अग्नि तत्ववृषकन्या और मकर पृथ्वी तत्वमिथुनतुला और कुंभ वायु तत्व तथा कर्कवृश्चिक और मीन जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। कालपुरुष की कुंडली में मेष का स्थान मस्तकवृष का मुखमिथुन का कंधे और छाती तथा कर्क का हृदय पर निवास है जबकि सिंह का उदर (पेट)कन्या का कमरतुला का पेडू और वृश्चिक राशि का निवास लिंग प्रदेश है। धनु राशि तथा मीन का पगतल और अंगुलियों पर वास है।

इन्हीं बारह राशियों को बारह भाव के नाम से जाना जाता है। इन भावों के द्वारा क्रमश: शरीर
धनभाईमातापुत्रऋण-रोगपत्नीआयु,धर्मकर्मआय और व्यय का चक्र मानव के जीवन में चलता रहता है। इसमें जो राशि शरीर के जिस अंग का प्रतिनिधित्व करती हैउसी राशि में बैठे ग्रहों के प्रभाव के अनुसार रोग की उत्पत्ति होती है। कुंडली में बैठे ग्रहों के अनुसार किसी भी जातक के रोग के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं।

कोई भी ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उन अंगों को नुकसान पहुंचाता है। उदाहरण के लिए जब सिंह राशि में शनि और मंगल चल रहे हों तो मीन लग्न मकर और कन्या लग्न में पैदा लोगों के लिए यह समय स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता।


अब सिंह राशि कालपुरुष की कुंडली में हृदय
पेट (उदर) के क्षेत्र पर वास करती है तो इन लग्नों में पैदा लोगों को हृदयघात और पेट से संबंधित बीमारियों का खतरा बना रहेगा। इसी प्रकार कुंडली में यदि सूर्य के साथ पापग्रह शनि या राहु आदि बैठे हों तो जातक में विटामिन ए की कमी रहती है। साथ ही विटामिन सी की कमी रहती है जिससे आंखें और हड्डियों की बीमारी का भय रहता है।

चंद्र और शुक्र के साथ जब भी पाप ग्रहों का संबंध होगा तो जलीय रोग जैसे शुगर
मूत्र विकार और स्नायुमंडल जनित बीमारियां होती है। मंगल शरीर में रक्त का स्वामी है। यदि ये नीच राशिगतशनि और अन्य पाप ग्रहों से ग्रसित हैं तो व्यक्ति को रक्तविकार और कैंसर जैसी बीमारियां होती हैं। यदि इनके साथ चंद्रमा भी हो जाए तो महिलाओं को माहवारी की समस्या रहती है जबकि बुध का कुंडली में अशुभ प्रभाव चर्मरोग देता है।


चंद्रमा का पापयुक्त होना और शुक्र का संबंध व्यसनी एवं गुप्त रोगी बनाता है। शनि का संबंध हो तो नशाखोरी की लत पड़ती है। इसलिए कुंडली में बैठे ग्रहों का विवेचन करके आप अपने शरीर को निरोगी रख सकते हैं। किंतु इसके लिए सच्चरित्रता आवश्यक है। आरंभ से ही नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।


आचार्य विपिन कृष्णा शास्त्री 
ज्योतिषी, वेदपाठी एवं कथा वाचक 
09015256658, 09968322014

Sunday, 6 January 2013

भारतीय ज्योतिष एक राह के रूप में

ज्योतिष को वेद का नेत्र कहा गया है मानव समाज को आज के भोतिक परिवेश में यत्र तत्र सर्वत्र ज्योतिष की परम आवश्यकता है ज्योतिष शास्त्र के द्वारा ही हमें भविष्य में होनी वाली प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष घटनाओं से अवगत कराया जाता है ज्योतिष हमारा पथ प्रदर्शक है.

भारतीय ज्योतिष शास्त्र काल गणना का प्राचीन ग्रन्थ है इसके आधार पर ही खगोल शास्त्री काल की गणना करते है .ज्योतिष शास्त्र दो विधाओ पर आधारित है पहला गणित तथा दूसरा फलित .

इन्ही दो विधाओ के आधार पर गणितज्ञ और फलितज्ञ प्रश्नों का समुचित समाधान करके प्रश्नोत्तर देते है ज्योतिष शास्त्र में जितना महत्व गणित का है उतना ही महत्व फलित का भी है क्योकि फलित का मूल आधार ही गणित है गणित के माध्यम से ज्योतिर्विद सम्बंधित व्यक्ति की प्रश्न कुंडली,जन्मकुंडली ;नवांश कुंडली ;चलित चक्र;षड्वर्ग ;सप्तवर्ग ,रेखाष्टक,विन्शोंतरी ,योग्निदशा ,परमआयु दशा आदि के आधार पर मुहुर्तादी का शुभाशुभ फल भी ज्योतिषीय गणित के आधार पर ही किया जाता है .हजारो वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति का नेत्र कहा जाने वाला ज्योतिषीय शास्त्र आज भी अपनी प्रमाणिकता के कारण अपनी कीर्ति कौमुदी को चारो दिशाओ में फहरा रहा है.

भारत वर्ष में इस त्रिकालदर्शी शास्त्र का जन्म हजरोवर्ष पूर्व मानव प्राणी के कल्याण के लिए अर्थात अज्ञानी को ज्ञानी, नास्तिक को आस्तिक ;दुखियो को सुखी तथा पतितो का उद्धार कर उनके मन में राष्ट्रधर्म की भावना उत्पन्न करने के लिए हुआ था इसके ज्ञान से प्रत्येक व्यक्ति ,कुटुंब व् सम्माज लाभान्वित होते है , ज्योतिष का फलित विभाग आपत्ति रूपी समुद्र को पार करने वाली नोका,प्रवास समय में उचित सलाह देने वाला सच्चा मित्र व् धन अर्जित करते समय योग्य मार्ग दर्शक मंत्री कहलाता है

आचार्य विपिन कृष्ण शास्त्री 
दिल्ली ,उत्तराखंड