Pandit Vipin Krishna Shastri: Astrolger & Katha Vyas

Pandit Vipin Krishna Shastri-Astrolger & Katha Vyas

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Thursday, 27 August 2015

ज्योतिष में केतु ग्रह का जातक पर प्रभाव


केतु एक छाया ग्रह है केतु मंडल ध्वजाकार है मनुष्य के शरीर में केतु अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है केतु ग्रह के सूर्य और चन्द्रमा शत्रु हैं.

जन्म कुण्डली में प्रथम लग्न भाव ,षष्ठम भाव ,अष्ठम भाव ,और एकादश भाव में केतु ग्रह को शुभ नहीं माना जाता है. कुण्डली में केतु ग्रह के द्वारा जब जातक पीड़ित रहता है तो जातक के व्यवहार में विकारता दिखाई देने लगती है जातक के मन दुराचार की भावना प्रबल हो जाती है, वात  कफ जन्य रोग से जातक पीड़ित रहता है. कुण्डली में जिस भी भाव में केतु रहता है उसी भाव के अनुरूप केतु अपना अच्छा और बुरा प्रभाव अवश्य डालता है. जीवन को संघर्षमय बना देता है. यह एक ऊष्ण और तमोगुणी ग्रह है और केतु की मीन और धनु उच्च राशियाँ हैं. केतु के कुप्रभाव से जोड़ों में दर्द,संतान कष्ट,पारिवारिक कलह,पेशाब संबधित विकार से जातक पीड़ित रहता है.

कुण्डली में केतु और सूर्य ग्रह की युति होने से व्यवसाय में उतार चढ़ाव देखने को मिलता है. जातक के पिता के 
स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. यश सम्मान, प्रतिष्ठा और सुख में कमी आती है.

चन्द्रमा और केतु की युति होने से मानसिक तनाव बढ़ता है.

केतु और मंगल की युति होने से जातक के अंदर क्रोध की अधिकता, हिसा की प्रवृति दिखाई देने लगती है.

केतु और बुध की युति होने से जातक के अंदर कपट की भावना बढ़ने लगती है और जातक धर्म कर्म से हीन होकर 
नास्तिक बन जाता है.

केतु और गुरु की युति होने से जातक के नास्तिकता बढ़ने लगती है और जातक के अंदर सत्वगुण में कमी आने लगती है.

केतु और शुक्र की युति होने से जातक के अंदर  स्त्री लोलुपता की भावना बढ़ने लगती है.

केतु और शनि की युति होने से जातक के अंदर हिसक प्रवृत्ति बढ़ने लगती है और जातक आत्मघाती भी बनने लगता है.

इसलिए केतु ग्रह से यदि कोई पीड़ित हो तो किसी अच्छे विद्वान से कुण्डली का विश्लेषण अवश्य करवाएं

केतु ग्रह की शान्ति के लिये उपाय


केतु ग्रह के मन्त्र का अवश्य जाप करें. हनुमान जी की उपासना करें. मंगलवार का व्रत रखें अन्यथा सर्वारिष्ट शान्ति हेतु शिवार्चन और महा मृत्युंजय का जाप करें.

शुभम भूयात् 
पंडित आचार्य विपिन कृष्ण कांडपाल
Pandit Vipin Krishna Kandpal

Tuesday, 4 November 2014

ज्योतिष में नक्षत्रों का महत्व

जीवन में किसी भी प्रकार का यदि आप शुभ कार्य करते हैं तो उस कार्य को  प्रारम्भ करते समय सर्वप्रथम नक्षत्र का विचार अवश्य कर लेना चाहिए जिस समय नक्षत्र का शुभ काल आरम्भ हो उसी समय कार्य आरम्भ करना चाहिए नक्षत्र [काल]अर्थात समय का एक मुख्य अंग है और इसका ज्ञान होना परम आवश्यक है आकाश मण्डल के बारह भाग को राशि और सत्ताईश विभाग को नक्षत्र कहते हैं चंद्रमा को प्रत्येक नक्षत्र का भ्रमण करने में १२ अंश २० कला का समय लगता है इस गति से भ्रमण करने पर चन्द्रमा २७ नक्षत्रो का भ्रमण ३६० अंश में पूर्ण करता है जिस प्रकार से मनुष्य बस या रेलगाड़ी से जब भ्रमण करता है तो बीच मार्ग में छोटे छोटे स्टेशनों पर भी दृष्टिपात करता है अथवा ये कहा जाय कि मनुष्य ने बीच बीच में छोटे छोटे स्टेशनों का निर्माण भी किया है उसी प्रकार सृष्टि कर्ता ने आकाश मंडल में राशि और नक्षत्र रूपी तारों के रूप में छोटे छोटे स्टेशनों का निर्माण कर उनका अंतर निश्चित किया है सृष्टि के आरम्भ 

काल से लेकर आजतक ये तारे अपने स्थान पर स्थित हैं इसलिए इन्हें स्थिर अथवा निश्चल कहते हैं

                       न सरति तत् नक्षत्रम

फलित वर्तते समय सर्व प्रथम नक्षत्र का विचार किया जाता है

१-अश्वनी
२-भरणी
३-कृतिका
४-रोहणी
५-मृगशिरा
६-आर्द्रा
७-पुनर्वसु
८-पुष्य
९-अश्लेषा
१०-मघा
११-पूर्वा फाल्गुनी
१२-उत्तरा फाल्गुनी
१३-हस्त
१४-चित्रा
१५-स्वाति
१६-विशाखा
१७-अनुराधा
१८-ज्येष्ठा
१९-मूल
२०-पूर्वाषाढा
२१-उत्तराषाढा   
२२-श्रवण
२३-धनिष्ठा
२४-शतभिषा [शत तारका ]
२५-पूर्वा भाद्रपद
२६-उत्तरा भाद्रपद
२७- रेवती

इस प्रकार से इन सत्ताईश नक्षत्रों के सिवाय अभिजित नाम एक नक्षत्र और है लेकिन इसकी गणना नक्षत्रों की कक्षा में नहीं की गई है क्योकि चन्द्रमा जिस मार्ग से आकाश में भ्रमण करता है उस मार्ग से यह नक्षत्र उत्तर दिशा में बाहर की ओर होने के कारण चन्द्र नक्षत्रो में इसका वर्णन नहीं किया जाता है

नक्षत्रों में शुभ ओर अशुभ नक्षत्र भी होते हैं इसलिए प्रत्येक कार्य को करने के लिये इनका विचार करना परम आवश्यक है .

२७ नक्षत्रों में १८ नक्षत्र शुभ माने गये हैं ओर बाकी ९ नक्षत्र –भरणी ,कृत्तिका ,आर्द्रा,आश्लेषा,मघा,ज्येष्ठा ,मूल,धनिष्ठा ,शतभिषा [शततारका ] ये अशुभ माने गये हैं अत:इसका विचार अवश्य कर लेना चाहिए.

क्रमश: जारी......

शुभम भूयात
पंडित आचार्य विपिन कृष्ण शास्त्री
Pandit Acharya Vipin Krishna Shastri

Hindu Priest & Astrologer

Monday, 22 September 2014

Jyotish-शनि ग्रह एक संक्षिप्त परिचय

शनि ग्रह तुला राशि में २० अंश पर परमोच्य और मेष राशि में २० अंश पर नीच रहता है. शनि सूर्या का पुत्र लेकिन पितृ शत्रु भी माना जाता है. शनि के प्रति जन मानस में अनेक भ्रांतियां हैं . कई लोग शनि को अशुभ ग्रह मानते हैं. लेकिन वास्तविकता यह है कि शनि संतुलन बनाकर प्रकृति में प्रत्येक प्राणी के साथ न्याय करता है.
स्कंध पुराण में शनि जन्म की कथा आती है कि सूर्य का विवाह दक्ष की कन्या “संज्ञा” के साथ हुआ. सूर्या के द्वारा संज्ञा के गर्भ से तीन संतान हुई.

१-      वैववश्वत मनु
२-      यमराज
३-      यमुना

भगवान सूर्य का तेज बड़ा प्रबल था और जिस तेज को संज्ञा सहन नही कर पाती थी. सूर्या के तेज को कम करने के लिये संज्ञा ने तप किया और तपोबल से अपनी जैसी दिखने वाली छाया को जन्म दिया जिसका नाम सुवर्णा रखा. सुवर्णा को संज्ञा ने अपने बच्चों की जिम्मेदारी देते हुए कहा- मेरे बच्चों की परवरिश करना, कोई आपति आवे तो मुझे कहना लेकिन यह भेद गुप्त रखना और किसी को मत बताना. अपने आप संज्ञा अपने मायके चली आयी. पिता ने बहुत फटकार लगाई कि बेटी को ससुराल छोड़कर पति की आज्ञा के बिना मायके नही आना चाहिए दोष लगता है. तुम पुन: अपने ससुराल चली जाओ. संज्ञा ने विचार किया कि आज ही मैंने छाया को कार्यभार सौंपा है तो उसका क्या होगा, इसलिए ससुराल न जाकर जंगल में घोड़ी का रूप धारण करके तप करने लगी.

इधर छाया और सूर्या के मिलन से तीन बच्चों का जन्म हुआ-

१-       मनु
२-       शनि
३-       भद्रा (लड़की)

जब शनि देव माँ के गर्भ में थे तो छाया ने घोर तप किया और उस तप की शक्ति का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ा . भीषण गर्मी में तप करने के कारण गर्भस्थ शिशु का रंग काला पड़ गया और जब बच्चे ने जन्म लिया तो वह काला हुआ. सूर्या ने जैसे ही बच्चे का रंग काला देखा तो हैरान हो गये, छाया पर शक किया, छाया को अपमानित किया और कहा कि यह मेरा बेटा नही हो सकता है.

शनि के अंदर माँ की तपस्या का बल था. अपनी माँ को जो अपमानित होते हुए देखा तो पिता पर क्रोध आया और क्रूर दृष्टि से अपने पिता सूर्या को देखा. देखते देखते सूर्या के शरीर का रंग काला हो गया, सूर्या के घोड़ों की चाल रुक गयी, सूर्या ने भगवान भोलेनाथ को पुकारा. भोलेनाथ ने कहा- तुमने अपनी स्त्री और पुत्र का अपमान किया है उसी के दोष के कारण ये सब हो रहा है. उसके बाद सूर्या देव ने क्षमायाचना की और पुन: अपना सुन्दर स्वरुप प्राप्त किया, घोड़ों की गति पूर्वरत हो गयी. लेकिन तब से शनि देव अपने पिता सूर्या के विद्रोही बन गये और अपनी माता के परम प्रिय बन गये.

भारतीय ज्योतिष के अनुसार शनि की २ राशियाँ हैं मकर और कुम्भ. शनि ग्रह जब रोहिणी का भेदन करता है तो तब पृथिवी पर अकाल पड़ने लगता है और यही योग जब राजा दशरथ के समय आने वाला था- तब राजा दशरथ ने ज्योतिषियों का सहारा लिया और ज्योतिषियों ने कहा जब यह योग आएगा तब अन्न जल का अभाव होगा और अन्न जल के अभाव से प्रजा तड़फ  तड़फ कर मर जायेगी. दशरथ को चिंता हुई और नक्षत्र मण्डल में जाकर शनि देवता की प्रार्थना की और शनि स्त्रोत की  रचना कर नित्य शनि की अराधना करने लगे, शनि देवता प्रसन्न हुए और दशरथ जी को वर मांगने को कहा.

तब दशरथ जी ने कहा कि- जब तक सूर्या एवं नक्षत्रादि विद्यमान रहे तब तक आप किसी देवता, मनुष्य आदि को भी कष्ट न दें.

लेकिन शनि देव ने कहा- जो आपके द्वारा रचित शनि स्त्रोत्र का नित्य वाचन करता रहेगा उसे में कभी पीड़ा नही दूँगा, अन्यथा जो नही करेगा तो जब में गोचर वश भ्रमण करूँगा तो मृत्यु तुल्य कष्ट दूँगा.

इसलिए शनि की शान्ति हेतु श्री महामृत्यंजय जप, तिल लोहा, काला वस्त्र, कस्तूरी आदि दान करना चाहिए. गोचर में जब शनि चंद्र राशि पर भ्रमण करते हैं तो साढ़ेसाती मानी जाति है. प्रत्येक मनुष्य को ३० साल में एक साढ़ेसाती अवश्य आती है और साढ़ेसाती के दौरान शनि देवता पूर्व के किये हुए अच्छे और बुरे कर्मों का फल अवश्य देते हैं. शनि के साढ़ेसाती के समय शनि स्त्रोत का पाठ, सुन्दरकाण्ड, महामृत्यंजय जप आदि करना शुभ रहता है.

शनि के साढ़ेसाती के काल में ईश्वर आराधन परमावश्यक है. शनि के साढ़ेसाती के काल मनुष्य को अच्छे कार्य करने के बारे में सोचना चाहिए और मन को सदैव प्रभु चरणों में लगाना चाहिए. ऐसा करने से शनि ग्रह संकट ग्रस्त स्तिथि में मनुष्य को दुःख के तीक्ष्ण घावों को सहन करने की अदुतीय शक्ति प्रदान करता है.

हमारा ब्यक्तिगत मत है कि ग्रहों की आराधना वंदन करना प्रत्येक मनुष्य का परम् कर्तव्य है, अन्यथा वह कष्ट का भाग्गेदार बनता है, ऐसे अनेक उदाहरण हमारे धर्म शास्त्रों और आज के लोक जीवन में देखने को मिलते हैं.

शुभम भूयात

आचार्य पंडित विपिन कृष्ण शास्त्री (काण्डपाल)
कथा वाचक, वेदपाठी, कर्मकाण्डी एवं ज्योतिषी Acharya Vipin Krishna ShastriJyotishi, Vedpathi & Katha VachakMobile- 09015256658, 09968322014


Monday, 21 October 2013

Kemadruma Yoga (Hindu astrology)-केमद्रुम योग ज्योतिष

जन्म कुण्डली में चन्द्रमा से बारहवें तथा दूसरे भाव में यदि एक भी ग्रह हो तो उसे केमद्रुम योग कहते हैं इस प्रकार की जब स्थिति जब कुण्डली में  बनती है तो जातक से लक्ष्मी का वियोग होता है .

कुण्डली में यदि चन्द्रमा को सम्पूर्ण ग्रह देख रहो हों तो केमद्रुम योग को भंग कर जातक को सम्पूर्ण सुख की प्राप्ति होती है और जातक चिरंजीवी रहता है .

चन्द्रमा से यदि केन्द्र [1-4-7-10] भाव में यदि सब ग्रह स्थित हों तो केमद्रुम योग को नष्ट कर जातक को श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होती है इसी प्रकार जन्मकुंडली में यदि जातक की मेष राशि हो और मंगल और गुरु तुला राशि में स्थित हों और सूर्य कन्या राशिगत हो तो व्यक्ति को राजयोग का फल मिलना संभव रहता है 
  शुभम भूयात  


Acharya Vipin Krishna
Jyotishi, Vedpathi & Katha Vachak
West Vinod Nagar Delhi

Mobile- 09015256658, 09968322014

Saturday, 20 July 2013

शनि राहू केतु का मानव जीवन पर प्रभाव और उपरी हवा से सम्बन्ध

अक्सर हम लोग कहा करते हैं कि उपरी हवा लग गयी है. हमारे धर्म ग्रंथों में इसकी विस्तृत विवेचना की गयी है.
कुछ ग्रन्थ इन्हने बुरी आत्मा मानते हैं, लेकिन ज्योतिष के शनि, राहु, केतु विशेष रूप से उपरी हवा का कारक ग्रह माना गया है.

उपरी हवाओं का विशेष प्रभाव कुऐं, चोराहे तथा गंदे स्थानों में होता है, इसलिए ऐसी जगहों पर जाने वालों पर उपरी हवा अपना विशेष प्रभाव डालती है तथा रात और दिन के अभिजित समय (रात के १२ बजे और दिन के १२ बजे) में इनका प्रभाव विशेषरूप से द्वार के चोखट पर माना गया है.

ज्योतिष के अनुसार जब राहु, केतु और शनि का प्रभाव जातक की कुंडली में मन, शरीर और धर्म भाव पर रहता है इस स्तिथि में उपरी हवाएं सक्रिय हो जाती हैं. चन्द्रमा पर जब इन क्रूर ग्रहों का प्रभाव रहता है तब मन की स्थिरता विचलित होने लगती है क्योंकि चन्द्रमा मन का कारक है और इन क्रूर ग्रहों का प्रभाव जब मन पर पड़ता है तो मन की अस्थिरता के कारण जीवन अस्त ब्यस्त हो जाता है.

इस प्रकार की शक्तियां हमें दिखाई तो नही देती लेकिन हमारा जीवन इन अदृश्य शक्तियों के कारण डग मगाने लगता है.

इस प्रकार की बुरी शक्तियों के निवारण हेतु उपाय:


दुर्गा सप्तशती का सम्पुटित पाठ
- बजरंग बाण का पाठ
- गूगल का धूप देकर हनुमान चालीसा पाठ
- ब्यापार में समस्या हो तो- गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करें और ब्यापार स्थल पर एकाक्षी श्रीफल की स्थापना करें

- घर की महिलाएं यदि पीड़ित हों तो शुक्रवार को माता के मंदिर में मेहँदी चढायें

- घर में मत्स्य यन्त्र की स्थापना और नित्य पूजन करें

- स्फटिक की माला धारण करें

शुभम भूयात

आचार्य विपिन कृष्ण शास्त्री
वेदपाठी, ज्योतिषी एवं कथा वाचक
०९०१५२५६६५८  


Pandit Vipin Krishna Shastri

Ved Pathi, Astrologer and Katha Vachak

Wednesday, 17 July 2013

मानव जीवन पर ग्रह राशियों का नकारात्मक प्रभाव -ज्योतिष कुंडली

ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उनको नुकसान पहुंचाता है। नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।

वैदिक वाक्य है कि पिछले जन्म में किया हुआ पाप इस जन्म में रोग के रूप में सामने आता है। शास्त्रों में बताया है--पूर्व जन्मकृतं पापं व्याधिरूपेण जायते- अत: पाप जितना कम करेंगेरोग उतने ही कम होंगे। अग्निपृथ्वीजलआकाश और वायु इन्हीं पांच तत्वों से यह नश्वर शरीर निर्मित हुआ है।

इन्हीं में मेष
सिंह और धनु अग्नि तत्ववृषकन्या और मकर पृथ्वी तत्वमिथुनतुला और कुंभ वायु तत्व तथा कर्कवृश्चिक और मीन जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। कालपुरुष की कुंडली में मेष का स्थान मस्तकवृष का मुखमिथुन का कंधे और छाती तथा कर्क का हृदय पर निवास है जबकि सिंह का उदर (पेट)कन्या का कमरतुला का पेडू और वृश्चिक राशि का निवास लिंग प्रदेश है। धनु राशि तथा मीन का पगतल और अंगुलियों पर वास है।

इन्हीं बारह राशियों को बारह भाव के नाम से जाना जाता है। इन भावों के द्वारा क्रमश: शरीर
धनभाईमातापुत्रऋण-रोगपत्नीआयु,धर्मकर्मआय और व्यय का चक्र मानव के जीवन में चलता रहता है। इसमें जो राशि शरीर के जिस अंग का प्रतिनिधित्व करती हैउसी राशि में बैठे ग्रहों के प्रभाव के अनुसार रोग की उत्पत्ति होती है। कुंडली में बैठे ग्रहों के अनुसार किसी भी जातक के रोग के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं।

कोई भी ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उन अंगों को नुकसान पहुंचाता है। उदाहरण के लिए जब सिंह राशि में शनि और मंगल चल रहे हों तो मीन लग्न मकर और कन्या लग्न में पैदा लोगों के लिए यह समय स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता।


अब सिंह राशि कालपुरुष की कुंडली में हृदय
पेट (उदर) के क्षेत्र पर वास करती है तो इन लग्नों में पैदा लोगों को हृदयघात और पेट से संबंधित बीमारियों का खतरा बना रहेगा। इसी प्रकार कुंडली में यदि सूर्य के साथ पापग्रह शनि या राहु आदि बैठे हों तो जातक में विटामिन ए की कमी रहती है। साथ ही विटामिन सी की कमी रहती है जिससे आंखें और हड्डियों की बीमारी का भय रहता है।

चंद्र और शुक्र के साथ जब भी पाप ग्रहों का संबंध होगा तो जलीय रोग जैसे शुगर
मूत्र विकार और स्नायुमंडल जनित बीमारियां होती है। मंगल शरीर में रक्त का स्वामी है। यदि ये नीच राशिगतशनि और अन्य पाप ग्रहों से ग्रसित हैं तो व्यक्ति को रक्तविकार और कैंसर जैसी बीमारियां होती हैं। यदि इनके साथ चंद्रमा भी हो जाए तो महिलाओं को माहवारी की समस्या रहती है जबकि बुध का कुंडली में अशुभ प्रभाव चर्मरोग देता है।


चंद्रमा का पापयुक्त होना और शुक्र का संबंध व्यसनी एवं गुप्त रोगी बनाता है। शनि का संबंध हो तो नशाखोरी की लत पड़ती है। इसलिए कुंडली में बैठे ग्रहों का विवेचन करके आप अपने शरीर को निरोगी रख सकते हैं। किंतु इसके लिए सच्चरित्रता आवश्यक है। आरंभ से ही नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।


आचार्य विपिन कृष्णा शास्त्री 
ज्योतिषी, वेदपाठी एवं कथा वाचक 
09015256658, 09968322014

Sunday, 6 January 2013

भारतीय ज्योतिष एक राह के रूप में

ज्योतिष को वेद का नेत्र कहा गया है मानव समाज को आज के भोतिक परिवेश में यत्र तत्र सर्वत्र ज्योतिष की परम आवश्यकता है ज्योतिष शास्त्र के द्वारा ही हमें भविष्य में होनी वाली प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष घटनाओं से अवगत कराया जाता है ज्योतिष हमारा पथ प्रदर्शक है.

भारतीय ज्योतिष शास्त्र काल गणना का प्राचीन ग्रन्थ है इसके आधार पर ही खगोल शास्त्री काल की गणना करते है .ज्योतिष शास्त्र दो विधाओ पर आधारित है पहला गणित तथा दूसरा फलित .

इन्ही दो विधाओ के आधार पर गणितज्ञ और फलितज्ञ प्रश्नों का समुचित समाधान करके प्रश्नोत्तर देते है ज्योतिष शास्त्र में जितना महत्व गणित का है उतना ही महत्व फलित का भी है क्योकि फलित का मूल आधार ही गणित है गणित के माध्यम से ज्योतिर्विद सम्बंधित व्यक्ति की प्रश्न कुंडली,जन्मकुंडली ;नवांश कुंडली ;चलित चक्र;षड्वर्ग ;सप्तवर्ग ,रेखाष्टक,विन्शोंतरी ,योग्निदशा ,परमआयु दशा आदि के आधार पर मुहुर्तादी का शुभाशुभ फल भी ज्योतिषीय गणित के आधार पर ही किया जाता है .हजारो वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति का नेत्र कहा जाने वाला ज्योतिषीय शास्त्र आज भी अपनी प्रमाणिकता के कारण अपनी कीर्ति कौमुदी को चारो दिशाओ में फहरा रहा है.

भारत वर्ष में इस त्रिकालदर्शी शास्त्र का जन्म हजरोवर्ष पूर्व मानव प्राणी के कल्याण के लिए अर्थात अज्ञानी को ज्ञानी, नास्तिक को आस्तिक ;दुखियो को सुखी तथा पतितो का उद्धार कर उनके मन में राष्ट्रधर्म की भावना उत्पन्न करने के लिए हुआ था इसके ज्ञान से प्रत्येक व्यक्ति ,कुटुंब व् सम्माज लाभान्वित होते है , ज्योतिष का फलित विभाग आपत्ति रूपी समुद्र को पार करने वाली नोका,प्रवास समय में उचित सलाह देने वाला सच्चा मित्र व् धन अर्जित करते समय योग्य मार्ग दर्शक मंत्री कहलाता है

आचार्य विपिन कृष्ण शास्त्री 
दिल्ली ,उत्तराखंड